रंगमंच रंगमंच रंगमंच
रंगमंच
रंगमंच रंगमंच
“मैं
तुम्हें कम नहीं आँकता, लेकिन तुम भी मुझे कम मत आँकना।” कुछ ऐसे ही भावों का
ज्वालामुखी उसके अंदर उबल रहा था, लेकिन वह चुप था। चाहता था वह कर दे उल्टी उन
कठोर संवादों की, लेकिन वह चुप था। उसके हाथ में इस्तीफ़ा था और उससे भी कड़वे थे,
वे इस्तीफ़ा थमाने वाले। उन लोगों को उसकी आकांक्षा थी, लेकिन वे अपने से समान उत्कृष्ट उस
रंगकर्मी को अपने सामने नहीं देखना चाहते थे। विकास के चरण पर उस अबोध रंगकर्मी की
बली चढ़ा दी गई, मगर वह फिर भी आश्वस्त था। उसे असीम विश्वास था अपने उस भगवान पर,
जिससे उसने एक दिन, एक छत पर उसके साथ हो रहे खराब व्यवहार का ताना मारा था। उसका
मानना था, आज उसी भगवान ने एक बार फिर उसे आत्मचिंतन का सौभाग्य दिया है। हाँ, वह
थोड़ा नाराज़ भी है।
वह
सोचता है, जब उसके पास कुछ नहीं था, तो क्या था? वह तब एक जादू से परिचित होता है,
रंगमंच। वह सोचता है, जब वह सबके साथ अच्छा था, तब उसे क्या मिला? वह तब खाता है
नंगे तौर पर गाली उनसे। वह तब पाता है स्वयं को एक मंच पर, जहाँ जीवन रूपी नाटक हो
रहा है, क्योंकि ‘नाटक तो उसके पीछे के सत्य को देखने के लिए देखा जाता है’ उसे
मालूम नहीं कि वह कब समाप्त होगा, वह बस टिका है, एक सच्चे रंगकर्मी की तरह। वह
एक-एक संख्या बद्ध अनाब-शनाब गालियाँ खा रहा है, और मौन होकर अपना अभिनय जारी रखे
है। वह जाता भी तो कहाँ जाता, वहाँ उसका मन लग गया था। लेकिन अब वह नहीं जाना चाहता वापस उन
लोगों के पास, जिन्होंने उससे पूछा था, “तेरा योगदान क्या है?” वह अपनी कमाई से ज़्यादा,
अपने खर्चे वक़्त पर नाराज़ है।
सबका अपना करिश्मा है, कोई कहीं बड़ा होता है, तो कोई कहीं। उसका चरखा चल पड़ा है। वह अपने कीचड़ से काले पड़ चुके कपड़ों को छिटकता है, मानों कोई दृश्य बदलने वाला हो। आज उसकी प्रस्तुति खुद कह रही है, “अब वो दौर नहीं आएगा। आएगा तो एक नया दौर, जिसके लिए मैं तैयार हूँ और तुम्हें भी तैयार रहना चाहिए।” वह सीख रहा है अपने सामने आने वाली चुनौतियों से। वह अब किसी से कुछ नहीं कहता, वह पी जाता अपने ग़म कभी किसी दोस्त की शादी में, या अपने घर बनी सादी रोटी में ख़ुश रहता है।
Comments
Post a Comment
Hey, if you like the blog, please support and appreciate me 🤙