युवा और उसकी गति
युवा और उसकी गति
युवा का अर्थ ही सदैव ऊर्जावान, उत्साहित और नवाचार है। आज
का युवा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मूल्यों को भली भाँति जानता है, परंतु
जीवन की यात्रा में वह गति को जीवन का पर्याय बना लेता है। ये गति शारीरिक ही नहीं
बौद्धिक, मानसिक और भावनात्मक होती है। आज का युवा जिज्ञासु है, परंतु समृद्ध,
शक्तिशाली और विकसित बनने की भाग-दौड़ में ये भूल जाता है कि जीवन के रस का आनंद
अनियंत्रित गति के साथ नहीं लिया जा सकता।
उन्हें गति एक अद्भुत योग्यता लगती है, किन्तु उसे
नियंत्रित करना और उसे सही दिशा दे पाना युवा अवस्था में उपेक्षाकृत कठिन है। हम
सभी ये तो जानते हैं कि जीवन की यात्रा में कई पड़ाव हैं, जब उमंगों का सागर
स्वतंत्र आकाश छूना चाहता है। युवावस्था वो पड़ाव है, जहाँ नन्हें कदम धारा रूपी
सहायक नदियों से मिलकर गति प्राप्त करते हैं परंतु उन्हें अनियंत्रित होकर सदैव
मुँह के बल धम्म से गिरना पड़ता है। “गिरना पड़ता है” इसलिए, कि ये सार्वभौमिक है।
युवा सोचता है कि दुनिया भर की समस्याएं केवल उसके साथ ही हैं, क्योंकि उसकी
मतवाली गति उसे कुछ और विचार करने का समय ही नहीं देती।
हाँ एक चीज़ और है जो सभी को चाहिए, और वो है सफलता। बड़े
दिशा दिखा गए हैं कि सफलता और कुछ नहीं, हमारे आस-पास धुंध में छिपी स्वयं से
स्वयं की भेट है। परंतु वो किसी ऐसी भाषा की खोज में हैं, जो उन्हें सफलता के सही
मूल्य सरल और सटीक तरीके से समझा सके।
मैं स्वयं इस युवा वर्ग का हिस्सा हूँ। मैं समझ सकता हूँ- उनकी
आकुलता जल्द कदमों को आगे रखने की, उनका भय उनके मानवीय रिश्तों को अशक्त होता
देख, उनकी व्यथा कि उनकी नींद एक दिन महँगी हो जाएगी, उनका असंतोष जो उन्हें अपनों
के व्यंगों से मिलता है, और न जाने क्या-क्या कुचल देते हैं वे अपनी अनियंत्रित
गति से। गति एसी जैसे किसी से बचकर भाग रहा हो। थोड़ा ठहर के पूछा तो पता चला, यूँ
भागने का कारण है- सदैव संग रहने वाली चुनौतियाँ।
यानि, ये दौड़ चुनौतियों से चुनौतियों तक की है।
सर्वप्रथम ये समझना आवश्यक है, कि जीवन और लक्ष्य दो भिन्न
चीजें हैं। लक्ष्य को जीवन बनाना या जीवन को लक्ष्य बनाना आप पर निर्भर करता है। सफलता
का अभिप्राय तो मनुष्य को ही निर्वाचित करना है। यदि हम सीधे निर्वाचन पर प्रकाश
डालें, तो जीवन में सफलता से अभिप्राय है- आत्म प्रसन्नता।
गाँव-कस्बों से सपने लेकर निकलता युवा केवल दूर तक जाना
चाहता है, घर की आशाओं का बीज गढ़ कर, मुट्ठी में मनोबल बाँधे, संकल्प का चश्मा
पहने अपने कर्तव्य पथ पर चलने लगता है। सपनों को लक्ष्य मानकर लगाता है एक लंबी
छलाँग और पकड़ लेता है अनियंत्रित गति। ये कहानी हर युवा की है। इससे अभिप्राय ये
है कि जब जीवन के वो क्षण सामने आते हैं जब निराशा उसे घेर लेती है, तब उसे पथ पर
मिली कठिनाइयाँ ही स्मरण रहती हैं, क्योंकि आनंद के क्षण तो उसने अनुभव किए ही
नहीं। हथौड़ी कितनी भी चलाओ, निखरेगा वही जो नियंत्रण में रहकर कार्यरत रहेगा।
ज्योति मायने तब रखेगी जब प्रकाश प्रभावी हो।
वो क्या है जो सफलता का पर्याय है? उससे वो कैसे संतुष्ट
हो? युवा क्या करे?
इस सब का उत्तर है – एकाग्रता और आत्मनिरीक्षण। हम
अप्रत्यक्ष रह कर आनंद की आशा करते हैं, परंतु जब प्रत्यक्ष रूप से उसकी अनुभूति
का समय होता है तब अपनी गति के अधीन रहकर उसकी अवहेलना कर देते हैं। मेरे युवाओं,
आओ कुछ देर ठहर कर दुनिया के साहित्यकारों को पढ़ें, दुनिया भर के इतिहास को भी
खंगालें, अपनी शब्दावली की जाँच करें क्योंकि कोई भी संस्था आपके कार्य, कौशल,
उत्तरदायित्व के लिए आधिकारिक रूप से आदेश देती है, न कि आपके आनंद के क्षणों को
स्मरण करने के लिए प्रोत्साहित करती है। युवा को चाहिए कि वो कुछ देर नए अवसरों के
लालच को छोड़, ठहर कर उस आनंद के क्षण को जीए। अपनी रुचि से अलग निम्न कार्यों में
ध्यान लगाए, जहाँ उसे आनंद की अनुभूति हो सकती है। वो एक पौधा लगाना, ध्यान लगाना,
अकेले राष्ट्र दर्शन करना या स्वयं से बातें करना हो सकता है, जिससे उसमें एक नई
ऊर्जा का विकास होगा, जिसे वह नियंत्रित करने में दक्ष हो सकता है।
यदि अपने बीते क्षणों को स्मरण कर उससे हम कुछ सीख पाते
हैं, प्रसन्न चित्त स्वयं से परिचित हो पाते हैं, सही और गलत को तोल पाते हैं, तब
ही हम अपने गुरुओं द्वारा नैतिक और राष्ट्रीय शिक्षा का सामंजस्य स्थापित करने में
सक्षम हैं। अब समय है युवाओं के उद्बोधन और अपनी गति को नियंत्रित करने का।
यदि कुछ क्षण के लिए हम एक कलाकार के जीवन पर विचार करें तो
हम पाएंगे, कलाकार का मूल जीवन उसकी कला ही होती है। परंतु जब वह अपनी कला का
अभ्यास कर उसे दर्शकों के समक्ष प्रदर्शित करता है, तब प्रस्तुति के पश्चात वह
अपने और अपने दर्शकों के संबंध के आनंद को तालियों की गड़गड़ाहट के रूप में पाता है।
यदि किसी सूरत में प्रस्तुति उतनी सफल ना भी हो, तब भी वह उन पर विचार कर अगली
प्रस्तुति तक अपनी क्षमताओं और कौशल पर कार्य करता है, ताकि उसकी कला उसके दर्शकों
के लिए सदैव जीवित रहे। यही उसका लक्ष्य, जीवन और आनंद होता है।
चूँकि आज धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ने “जीवन” के अर्थ के
इर्द-गिर्द प्रतिबंधों की तारें बिछा दी हैं, इसलिए युवा के ऊपर छत्र क्षीण होता
जान पड़ता है। जीवन भर अपने लिए किया गया सब कुछ, स्वयं को अन्याय लगने लगता है।
युवा स्वयं की रुचि से किए गए कार्यों से कुछ क्षण के लिए तृप्त तो होता है, परंतु
जब जीवन निसार लगने लगता है, तब वह अपना धैर्य खो देता है।
आज के समय में सफलता का सही अभिप्राय युवा आत्म प्रसन्नता
को माने, क्योंकि लोग अपनी रुचि अनुसार अवसर पाकर भी खुश नहीं है। इन सब का कारण
उनके जीवन और उसके पर्याय अनियंत्रित गति ही है, जो सफलता प्राप्त करने के लिए
चुनी गई, किन्तु जीवन को सुखद बनाने वाले क्षणों से हमें अनभिज्ञ कर गई।
हम सदैव दूसरों को वो देते हैं, जो स्वयं के पास अधिक है। निराशा
केवल हतोत्साहन को जन्म देती है। इस हतोत्साहन को प्रोत्साहन में बदलने के लिए,
जीवन के हर छोटे बड़े आनंद की महत्ता को समझना अनिवार्य है।
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