जुगनू का टीला

जुगनू का टीला


गुरु-शिष्य परंपरा का अंतिम वर्ष था। विश्वविद्यालय में विभाग का कार्य समाप्त कर गुरु-शिष्य, रात्री भोज के लिए कच्चे जंगल के रास्ते से निकल रहे थे। रंगमंच की उन्नति और छात्रों के विकास पर चर्चा उस समय आम बात थी। तभी एक स्थान पर टिमटिमाते तारों को धरती पर देखा, मानों धरती ने आसमान का और आसमान ने धरती का स्थान ले लिया हो। 

दरअसल वो जगनुओं की जमात थी, जो जगमगा रहे थे, आसमान के तारों की तरह। उसे देख सभी के कदम कुछ रुक से गए, या यूँ कहूँ स्वयं प्रकृति ने उन्हें रोक लिया था। शिष्यों के साथ ‘सेंस ऑफ ह्यूमर के स्कूल’ के रूप में स्वयं गुरु भी उसका आनंद लेने रुक गए, क्योंकि जुगनुओं ने किसी भी प्रकाश विज्ञान का प्रशिक्षण लिए बिना, प्राकृतिक प्रकाश सज्जा की विन्यास रूप-रेखा बनाई हुई थी। शांत उस जंगल में, कुछ एक और आवाज़ उस जंगल की सुंदरता बढ़ा रही थी। कहीं ज़्यादा तो कहीं कम टिमटिमाते उस समूह को देख कर यह प्रतीत हो रहा था, जैसे उनमें बुज़ुर्ग और जवान दोनों जुगनूं थे, जो अपना अनुभव साझा कर रहे थे, उनकी प्रज्ञा जागृत कर रहे थे। वे उन्हें क्या सिखाने का प्रयास कर रहे थे, ये जैविक दृष्टि से देख पाना कठिन है। जुगनुओं के समूह की प्रभुता किसी भी सामाजिक तेवर को चुनौती देने में सक्षम थी, जैसे वे कह रहे हों, “तुम्हें पुनरुत्थान की आवश्यकता है।” 

                    उस दिन हमनें निश्चित कर लिया था, रंगमंच पर हमें हमेशा इन्हीं जुगनुओं की तरह ऐसे ही जगमगाना है। मुझे लगता है, ईश्वर पर नहीं ईश्वरत्व पर असीम श्रद्धा थी उन्हें, और अब हमें भी। वे बिना कुछ कहे अपना दार्शनिक होना सिद्ध कर रहे थे। वे जीवन से परे जान पड़ते थे। कुछ देर बाद हमनें अपना मौन तोड़ा और रात्री भोज के लिए देरी से, उन जुगनुओं की शाखा को छोड़ आगे बढ़ गए। 

गुरु-शिष्य भोज यानी ज्ञान भोज। ये उन अंतिम दिनों में से एक था, जिसमें हमें रंगमंच और जीवन दोनों पर शोध करना था। हालाँकि जैसा सब जानते हैं, शोध कभी खत्म नहीं होते। रात्री भोज कर उसी रास्ते से हम वापसी ले रहे थे। जुगनू अब भी वहीं थे, रोशनी का वृत और बढ़ चुका था, और भी सुंदर हो चुका था। लेकिन इस बार वो जुगनू हमें मोहित करने में असमर्थ रहे। क्या है ना, दुर्लभता ही आकर्षण की पूरक है। चीज़ें भरपूर रूप से उपलब्ध हो जाएं तो कितनी भी सुंदर हों, आकर्षण कम हो ही जाता है। 

गुरु जी ने भी समय का ध्यान रखते हुए कहा, “खेलने दो इन जुगनुओं को, इन्हें भी एकांत की आवश्यकता है। बस याद रखना ये पल, और ये ‘जुगनू का टीला’।” हमनें उन्हें खुश, आत्मचिंतन में छोड़ दिया। मैनें उन जुगनुओं को अपने कैमरे में कैद नहीं किया, रहने दिया आज़ाद उन्हें वैसे ही। 

इस पर क़मर एजाज़ साहब (औरंगाबाद) के एक बेहतरीन शेर की चंद लाइनें याद आईं।  

धोखा वफ़ा की राह में खाएं है हम ज़रूर,

लेकिन किसी के साथ में धोखा नहीं किया,

हमने गुज़ार दी है फ़क़ीरी में ज़िंदगी,

लेकिन कभी ज़मीर का सौदा नहीं किया,

दिल को जला के दी है ज़माने को रौशनी,

जुगनू पकड़ के हमने उजाला नहीं किया,

गुरुजी को सादर प्रणाम। 

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