कोई दिक्कत की बात नहीं

                    कोई दिक्कत की बात नहीं

     14 तारीख़ का वह दिन, उस दिन मैंने अपने माता-पिता से जन्मदिन का उपहार माॅंगा, जो कि एक हफ़्ते बाद था। उन्होंने मुझे मना नहीं किया। उन्होंने कहा - तुम चिंता मत करो तुम्हारा जन्मदिन हम घर पर अच्छे से मनाएंगे। इस बार मेरे जन्मदिन पर हम बाहर नहीं जा पाएंगे, क्योंकि कोरोना वायरस के चलते सभी स्थल बंद थे। इस बात पर मैं दुखी था, लेकिन इस बात पर खुश था कि मुझे अपने जन्मदिन पर उपहार ज़रूर मिल जाएगा। मैं खुशी से कूद रहा था, बड़े दिनों बाद आज खुशी का आभास हुआ, क्योंकि स्कूल बंद होने के कारण मैं इस लॉकडाउन में घर पर आराम करते-करते थक रहा था। मेरे पिता एक छोटे से गाॅंव में सरकारी नौकरी करते हैं, उनकी तनख्वाह काफ़ी अच्छी है इसलिए हमारा घर काफ़ी अच्छा है। वह इन दिनों घर पर ही कंप्यूटर पर काम करते हैं। किसी चीज़ की हमें कोई कमी नहीं है। अब मैं 21 तारीख़ को 15 साल का हो जाऊॅंगा, इस उत्साह में मैं अपनी बालकनी तक उत्साह से पहुॅंचा। मैंने देखा कि चार लोग मेरे बगल वाली झोपड़ी के बाहर तक पहुॅंच रहे हैं। वह झोपड़ी मेरे घर से काफ़ी नीचे थी, टूटी-फूटी पुरानी सी झोपड़ी, चारो ओर बाउंड्री और लकड़ी का साधारण दरवाज़ा। 1 साल पहले वहाॅं आग भी लगी थी, शायद ज़्यादा तेज़ धूप से उस झोपड़े की घास जल गई होगी। हमारे मकान को कोई ठेस नहीं आई, क्योंकि जल्दी से वो आग बुझा दी गई थी। उन 4 व्यक्तियों में एक मेरे बराबर का लड़का भी था, शायद मैं उसे जानता था, लेकिन याद नहीं। मैं काफ़ी देर तक उन्हें देखता रहा, वह लोग अपने मकान के दरवाजे के बाहर घंटों बैठे थे। उनमें एक पुरुष था, जो कि जवान था मेरे पिता की तरह, वह सिर झुकाए बैठा हुआ था। मुझे यह समझने में बहुत दिक्कत हो रही थी कि वह रो रहा है या ख़ुश हो रहा है?  कुछ देर उसकी ऑंखों से ऑंसू आते, तो कुछ देर बाद ऑंसू पोंछ कर मुस्कुराता। 

एक नारी जो कि उसकी पत्नी प्रतीत हो रही थी, और एक वृद्ध पुरुष जो कि उसका पिता प्रतीत हो रहा था, वे दोनों उसे सहानुभूति प्रदान कर रहे थे। मैं उनकी बात सुन रहा था, लेकिन वह मेरे समझ में नहीं आ रही थी। वह छोटा बालक जो कि मेरी उम्र का था, उसने मुझे देख लिया था, बार-बार मेरी ओर देखता और मुस्कुराता। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है ? कुछ क्षण बाद वह भागता हुआ मेरे मकान के नीचे आ गया और उसने मुझे आवाज़ लगाई - "ओए देख मैं आ गया।" मैं कुछ पल चकित हुआ। उसने मुस्कुराते हुए और बेमतलब की हॅंसी हॅंसते हुए कहा - "आजा गिल्ली डंडा खेलते हैं।" मुझे समझने में देर नहीं लगी, मैं समझ चुका था कि 2 वर्ष पहले उस जगह एक बच्चा रहता था, जो कि मेरा मित्र बन चुका था और हमेशा मैं उसके साथ खेला करता था। मुझे कुछ ठीक से याद नहीं लेकिन उस समय मैं केवल उसको ही जानता था, और केवल उसके साथ ही खेलता था। आज 2 वर्ष बाद देखने पर आश्चर्य होता है कि उसने मुझे पहचान लिया, लेकिन मैं उसे क्यों नहीं पहचान पाया? मैं रुका नहीं, मेरे पैर बाहर की ओर चल दिए। मैं उसके सामने आ खड़ा हुआ। वह इतनी गंदी अवस्था में था कि मानो न जाने कितने दिनों से ना नहाया हो। मिट्टी उसके चेहरे से लेकर पाॅंवो तक उस पर लिपटी हुई थी। मैंने बिना किसी हिचक के उससे गले मिला, उसने भी मुझे कसकर गले लगाया, जैसे हम पक्के मित्र हों। 
                 मैंने उससे पूछा कि तू कहाॅं चला गया था? उसने कोमल स्वर में उत्तर दिया "हम शहर चले गए थे। माॅं, पिताजी और दादा जी को वहाॅं अच्छा काम मिल गया था, इसलिए हम वहाॅं रहने चले गए थे। मैंने प्रश्न किया कि आज अचानक सब कैसे आ गए? वह बिना शर्माए, बिना हिचक के बोला - जहाॅं हम रहते थे, वहाॅं का मकान मालिक घर के किराए के पैसे माॅंग रहा था, और लॉकडाउन में माॅं, पिताजी और दादा जी का काम छूट चुका था‌ और जो रोज़ाना का राशन था, वह ख़त्म हो चला था। हमारे पास खाने को कुछ भी नहीं था, तो दादाजी ने सोचा कि हमें गाॅंव लौट आना चाहिए। यहाॅं कुछ ज़मीन है उस पर हम खेती करेंगे और भोजन जुटाया करेंगे"।
         मैं उसके चेहरे की ओर देखता रह गया। वह जिस ढंग से अपनी व्यथा सुना रहा था, मानो बालक ना होकर कोई जवान हो। उसने बताया कि वह शहर से गाॅंव तक पैदल चलकर आया है। जो कुछ भी वह कह रहा था उसे सुनकर मेरे मन में पीड़ा होने लगी थी। मैं और प्रश्न पूछना चाहता था, लेकिन उससे पहले उसकी माॅं ने उसे आवाज़ लगाकर बुलाया। मैंने देखा उन्होंने अपने घर का दरवाज़ा खोल लिया था, और वह अंदर की ओर जा रहे थे। मैं भी अपने घर के अंदर गया और माता-पिता को एक साथ बिठाकर, उन्हें घटना के बारे में बताने लगा। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह मेरी बातों को रोचक ढंग से सुन रहे हों। मैंने अपने मित्र का हाल सुनाया। और तभी मेरे मन में बात आई कि मैं उसे अपने जन्मदिन पर बुलाऊॅं। पिताजी ने कहा -"कोई दिक्कत कि बात नहीं", उन्हें किसी बात का संकोच नहीं था। ‌मुझे बस अब जन्मदिन की प्रतीक्षा थी।

              मेरा जन्मदिन आ चुका था, मैं सुबह से ही अच्छे कपड़े पहन कर घर में ही घूम रहा था। माॅं ने घर पर ही केक बनाना शुरू किया और मुझसे कहा - "जा अपने मित्र को शाम का न्योता दे आ।" मेरे माता-पिता को किसी बीमारी का डर नहीं था, वह ख़ुश थे मेरी ख़ुशी देखकर। मैं अपने मित्र के घर गया, देखा तो दरवाज़ा खुला हुआ था। मैंने आवाज़ लगाकर उसे बुलाया और कहा, "आज मेरे जन्मदिन पर उसे अवश्य आना है।" उसने बिना देर के हाॅं बोल दिया और मैंने उससे कहा कि आज मैं नहीं खेल पाऊॅंगा, क्योंकि आज मेरा जन्मदिन है। उसकी तैयारी में मुझे माॅं की सहायता करनी है। मैं यह कहकर वहाॅं से चला आया। शाम हो चुकी थी, और वह बिना हिचके घर में आया। वह पहले से काफ़ी साफ़-सुथरा था, सर में गहरा तेल, सफ़ेद रंग की शर्ट, जिसमें एक बटन दूसरे रंग का लगा था, पैरों में टूटी चप्पल थी। उसकी जेब में एक लंबी सी चीज़ रखी थी जो कि उभरी हुई प्रतीत हो रही थी, मैंने उससे उसके बारे में नहीं पूछा। मेरे माता-पिता ने उसका सम्मान पूर्वक स्वागत किया, उससे प्यार से बात की, हमने साथ में खाना खाया, और अंत में केक काटा। केक काटने के बाद हम शांति से बैठ गए और मैं उसे अपने उपहार दिखाने लगा। मेरे माता-पिता, मेरा मित्र और मैं एक साथ बैठकर हॅंस बोल रहे थे। उसने देखा कि सभी उपहार चमकीली पन्नियों में है, और वह भी एक-एक कर मेरे साथ उपहारों को खोलने में मेरी सहायता कर रहा था। उसके चेहरे से मालूम पड़ रहा था कि जैसे मुझसे ज़्यादा जन्मदिन की खुशी उसे हो। मैं उसे अभी तक नहीं समझ पा रहा था। उसने मुझसे कहा, "वह अभी आता है।" और वह चला गया। कुछ देर बाद जब वह आया तो उसने मेरे हाथ में चमकीली गंदी पन्नी में एक चीज़ लाकर दी। मैंने उसे खोला तो उसमें एक साफ़-सुथरी गिल्ली थी, क्योंकि हम रोज़ गिल्ली डंडा खेलते थे, तो उसने वह मुझे देना सही समझा। उसने मुझे गिल्ली उपहार में दी, जिसे उसने अपने हाथों से बनाई थी। पता नहीं क्यों लेकिन मेरे मन में आ रहा था, शायद मैं उसकी जगह होता तो यह ना देता, इससे भी अधिक बड़ी और महॅंगी चीज़ देता। लेकिन उसने बिना शर्माए मुस्कुराते हुए मुझे वो दी, उसके चेहरे की तेज़ मुस्कान मैंने आज तक नहीं देखी थी, और मैं उसे भूलूॅंगा भी नहीं। मेरे माता-पिता ने उसका प्रेम पूर्वक धन्यवाद दिया और मित्र होने के नाते मैंने भी उसको गले लगा कर धन्यवाद दिया। विश्राम कर रहे मेरे पिताजी ने उससे उठकर पूछा, "घर पर सब कैसे हैं?" उसने अपने घर का हाल बताया और कहा सब ठीक है। मेरे पिताजी शायद जानते थे कि कुछ ठीक नहीं है, सो उन्होंने फिर पूछा, "घर पर सब ने क्या कहा तुमसे, तुम यहाॅं आए तो?" उसने कहा, "पिताजी लेटे हुए थे, क्योंकि उनके पाॅंवो में छाले पड़ गए हैं। हमें एक सप्ताह हो गया है यहाॅं आए, अभी तक उनके छाले नहीं भरे हैं। मैंने यहाॅं आने से पहले उनसे अनुमति माॅंगी थी, उन्होंने कहा - "कोई दिक्कत की बात नहीं, तुम जाओ।", मेरे दादाजी बीमार हैं, उन्हें शरीर से उठा नहीं जा रहा है। वह मुझे सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं तो मैंने उनसे भी पूछा कि मैं अपने मित्र के जन्मदिन पर जाना चाहता हूॅं। उन्होंने भी कहा -"कोई दिक्कत की बात नहीं" और मैं तो माॅं से भी पूछ कर आया हूॅं कि क्या मैं यहाॅं आ सकता हूॅं? माॅं ने भी मुझे नहीं रोका उन्होंने भी कहा अच्छा सुन अगर वह खाना खिलाए तो तू खा लियो, "कोई दिक्कत की बात नहीं"।
             
 यह सब सुनकर मेरे माता-पिता मौन हो गए। जैसे वह कुछ और पूछने की हालत में ना हों। मेरी माॅं ने हिचक कर पुछा, "तुमने अपने खेतों में काम शुरू कर दिया? उसने कहा, "नहीं, अभी पिताजी और दादा जी बीमार हैं, और अकेली माॅं खेत नहीं जोत पाएगी, हमारे पास इतना पैसा भी नहीं है की खेतों में पानी, बीज और खाद लगा सकें।" यह सब मैं ध्यान से सुन रहा था। मैं काफी गहरी सोच में चला गया था, मेरे मन में चल रहा था कि काश मैं इसके परिवार की कुछ सहायता कर सकता। मेरे माता-पिता चुप रहे। काफी देर हो चुकी थी तो वह अपने घर वापस चला गया। रात काफ़ी हो चुकी थी, मैं अपने माता-पिता के बगल में लेटा था, शायद उन्हें लगा कि मैं सो गया हूॅं, लेकिन मैं उनकी बातें सुन रहा था। वह कह रहे थे कि उन्हें मेरे मित्र के परिवार की इस स्थिति में सहायता करनी चाहिए, माॅं ने कहा, "अगर हम 10-15 हज़ार रुपयों की उन्हें सहायता करें तो उन्हें अपनी स्थिति को संभालने में आसानी होगी।" मैं सब सुन रहा था, मुझे अपने माता-पिता की अच्छाइयों पर गर्व हो रहा था। उन्होंने आपस में परामर्श किया और पिताजी ने निश्चय किया कि वह कल जाकर मेरे मित्र के परिवार वालों से बात करेंगे, उनकी स्थिति जानेंगे। 

             आज 10 दिन हो चुके हैं, मुझे मेरा मित्र दिखाई नहीं दिया। वह कहाॅं गया यह जानने के लिए मैं प्रातः एक दिन उसके घर गया। उसके माता-पिता और दादा जी ने मेरा प्रेम पूर्वक स्वागत किया। मैं अपने मित्र से मिला और उससे हाल जानने लगा कि वह आजकल मेरे साथ खेलने क्यों नहीं आता? उसने कहा कि अब हम प्रातः खेतों में काम करने चले जाते हैं। खेतों में अभी बहुत काम बाकी है इसलिए हम सब एक साथ वहाॅं काम करते हैं। मैंने पूछा, "और कितना काम है खेतों का?" उसने बताया कि आधे से ज़्यादा खेत जुत चुका है और कुछ ही दिनों में उसके पिता खेतों में पानी देंगे और उसमें बीज बो‌ पायेंगे। 
                 मुझे उससे मिलकर अच्छा लगा, मैंने और कोई प्रश्न किए बिना वहाॅं से चला आया। मैंने अपने माता-पिता को बात करते हुए सुन लिया और जाना कि उन्होंने मेरे मित्र के परिवार वालों की पैसों से सहायता करी थी, इसलिए आज वह अपने खेतों में काम कर पा रहे हैं। मेरा हृदय शांत सा हो गया था। जैसे मैंने किसी गुरु का उपदेश सुन लिया हो। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मैंने उस दिन जीवन की सबसे बड़ी सीख ली। मुझे अपने माता-पिता की शिक्षा पर गर्व हुआ। मैंने भी निश्चय किया कि भविष्य में मैं अपने पिता की तरह बनूं। 

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