हिंदी वाले सपने

 हिंदी वाले सपने

मेरी यात्रा में ये अंग्रेज़ी चलन मेरे आड़े आ रहा है। ऐसा नहीं है मैं इससे डर गया हूँ, मैं बस रुक गया हूँ। प्रयास अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों, लेकिन अवसर की तलाश केवल अंग्रेज़ी पर खत्म होती है। मेरी चिंता ही यही है कि मैं सपने भी हिन्दी में देखता हूँ। हाँ, आते हैं आजकल कुछ लोग अंग्रेज़ी बड़बड़ाते, बुदबुदाते और चिल्लाते हुए मेरे सपने में, लेकिन फिर भी वह बोली मुझे गाली ही लगती है। गया था मैं एक बार अंग्रेज़ी सेंटर अंग्रेज़ी सीखने, और 2 साल अच्छे से सीखी भी। मगर मैं उससे जुड़ न सका, उल्टा ज़िंदगी भर इस चलन से निराश रहा। मैं दोस्त भी हिन्दी बनाता और दोस्ताना भी हिन्दी रखता। हमारी बातें भी हिन्दी होती और चाय भी हिन्दी होती। निराश कुछ दिन से सब फिर अंग्रेज़ी हो गया। जैसा मैंने बताया मैं डर नहीं रहा हूँ, बस ये डर बचा कर रखा है कि सही जगह काम आ जाए। फिलहाल यात्रा बहुत लंबी है। कभी ठहरूँगा तो ‘खुद’ बनूँगा। मैं ऐसी यात्रा पर निकलना चाहता हूँ, जहाँ कोई मुझसे कुछ ना पूछे। जहाँ मैं इशारों से रास्ता पूछूँ और वो इशारों से कहें “खुद ढूंढलो।” बिल्कुल भी आसान तो नहीं पूरी तरहअंग्रेज़ी जगमगाना और हिन्दी को मद्धम कर देना, क्योंकि मैं हिन्दी में रोशनी ढूँढता हूँ, हिन्दी में निराश होता हूँ। मैं आज भी कुछ रखकर भूल जाऊँ तो हिन्दी में ढूँढता हूँ, कभी प्रेम पत्र लिखता हूँ तो हिन्दी में बेहतर बयान करता हूँ, तो क्या मेरा मज़ाक उड़ाओगे, इज़्ज़त नहीं करोगे। किसी के पास अंग्रेज़ी और हिन्दी का प्रमाणपत्र है तो क्या? कुछ भी प्रश्न करोगे तुम? मुझसे तयशुदा व्याकरण में बात नहीं होती। मुझसे मेरी वाली हिन्दी में बात करो, “हिन्दुस्तानी” में बात करो, मुझे मेरे शब्दों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करो। कभी कोरे काग़ज़ खुले में रखकर भूल गया था, उस पर धूल जमा हो जाती थी। फिर उन खाली पन्नों को संभालकर रखता तो ख्याल आया, एक पेड़ ने मेरे लिए आहुति दी होगी। ओहदा तो नहीं कुछ भी, बस ढेर सारी शंका है। क्या लिखूँ जो लोग चाहते हैं, या मैं जिसे बेहतर जानता हूँ। दूसरी भाषा के चक्कर में लोग अपने लोगों को खोते जा रहे हैं। मैं जब घोल सकता हूँ मिठास और छींटाकशी अपनी भाषा में तो क्यों ना लिखूँ। मैं तो तब से लिख रहा हूँ, जब से कागज़ पर धूल वाली बात समझी। मेरे पास तो उस वक़्त कुछ था नहीं, मैं तो लिखता रहता था अपनी भाषा में, जिसे सिर्फ मैं समझता था। कभी कागज़ की खाली जगहों पर अलग-अलग चिन्हों का आविष्कार किया करता था, उन्होंने छुआ था मुझे। तुम्हारी भाषा से अलग बहुत सी बातें मेरे पास भी हैं, आओ, बैठो, पढ़ो कभी। मैं नहीं कहता ऐतराज़ है मुझे तुम्हारी बोली से, तुम्हारी भाषा से, अरे भई घाटा तुम्हारा, मुनाफा तुम्हारा। मगर मेरे चलने वाले रास्ते को बदलते क्यूँ हो, उसे गाली क्यूँ देते हो? तुम जानों तुम्हारी भाषा, मैं जानूँ अपनी। अन्य भाषा के रुझान को तुमने दूसरे के लिए प्रकोप बना डाला, मेरे चलने वाले रास्ते को दलदल बना डाला। बताओ कोई चलता है दलदल में क्या? तुम चलकर दिखाओगे? भई जिस भाषा बोली में तुम सपने देखते हो, वो है तुम्हारी भाषा बोली। तुम देखो अपने सपने, देखता रहूँगा मैं अपने सपने “हिन्दुस्तानी” में।   

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