खंबों पर तार

 

खंबों पर तार

यह तो होता आया है, सत्ताधीश बना देते हैं कुछ बानगी (नमूना) समय रहते और गल्ले पर बैठ जाते हैं। शुरुआत तो अच्छी ही रही होगी, कमाल भी होता होगा और जादू भी रहा होगा। दर्शक उसे देखने का कर यूनिट में देते हैं और देते रहते हैं। कर वसूलने के चक्कर में, हाथों में नोटों की जगह सामयिक बदलावों की ज़िम्मेदारी उठाने में आलस करते हैं। बस इसी मायाजाल में व्यस्त हैं बेचारे, जो गलियों में लगाए बुज़ुर्ग खंबों पर तारों का जाल नहीं देख पाते हैं। जैसे ज़माने भर से खूब मुहब्बत मिल रही हो। बुज़ुर्ग खंबे समय-समय पर तारों द्वारा बिजली की ट्रिपिंग से याद दिलाते भी हैं कि “मुझे आराम दो”। लेकिन तभी बिजली का बिल भरने की तारीख आ जाती है, और वे नोट गिनने में व्यस्त हो जाते हैं। तारों की सलाखें धूप से ज़मीन पर चींटियों के लिए छाँव पथ बनाती हैं और पंछियों की बैठक बन जाती हैं, वाकपटुता भी करते हैं वे। बेचारे बुज़ुर्गवार खराब मौसम की मार से खुद से लिपटी तारों का नुकसान देखते हैं। फिर होती है सुधार के नाम पर मरम्मत उनकी, मगर कब तक? बुज़ुर्ग खंबों के रिश्तेदार भी हैं, बिजली विभाग ने उनकी दूरी 45 से 50 मीटर निर्धारित की है, लेकिन उनके रिश्तों में दूरी 60 से 70 मीटर देखी गई है। जबरन उनके रिश्तों को हद से ज़्यादा तारों से लपेटा हुआ है, वे चाहते भी हैं की उनके समानांतर उनका थोड़ा बोझ उनका कोई साथी लेले, लेकिन सत्ताधीश के पास समय नहीं है, पैसे की हम बात नहीं करते। कर देते दर्शकों के सामने सत्ताधीशों की समस्या सार्वजनिक होनी चाहिए। इसके नतीजे में ये बुज़ुर्ग खंबे और उसपर ये तार कुछ-कुछ बचपन में खेले साँप सीढ़ी का वो खेल याद दिलाते हैं, लेकिन ये अब कुछ ज़्यादा ही उलझा हुआ लगता है। मैं कोई गुस्सा नहीं लिख रहा हूँ, मैं बस एक अख़बार के इश्तिहार के दावे को अपने शब्दों में लिख रहा हूँ। किसमें कितना दम है, भुगतान करने वाला जानता है। मैं तो बेकार आदमी हूँ, बेकार बातें करता हूँ। ‘अपने बच्चों की मौत पर बुज़ुर्ग भी रोते हैं’ मैं इस सीख को याद करते हुए लिख रहा हूँ। चाहता हूँ लोग अपनी समझ को समृद्ध बनायें और अपनी गलियों, सड़कों को चमकायें। और फिर ये आसान बात भी समझ न आए, तो बड़ी ख़राब बात है। नोटों को थोड़ा आराम देकर, ज़रा देखो सालों से खड़े खंबों को, कैसे थक गए हैं। आराम दो उन्हें। ताकतवर लोगों की ऐसी-तेसी करते हुए, देदो उन्हें ‘अंडरग्राउंड बिजली सिस्टम’ का तोहफा। इतनी परेशानी हमारे बुज़ुर्गों ने झेली, थोड़ी हम भी अपने ऊपर ले लेंगे।      

 

                                                                                                           

Comments

Popular posts from this blog

युवा और उसकी गति

जुगनू का टीला

रंगमंच रंगमंच रंगमंच