रिक्शा वाले भैया

रिक्शा वाले भैया

26 साल के राजू ने लोगों के समय की कीमत समझ ली है। उसने अपने पिता के रिक्शे में मोटर लगवा ली है, जिसे वह 6 महीनें से चला रहा है। वह अब अपने पिता की तरह ही गमछे को ज़िम्मेदारी की तरह ओढ़ता है। परिवार की रोज़ी-रोटी के लिए, रिक्शे को किसी न किसी को धकेलना था, सो ये ज़िम्मा राजू के कंधों पर आया। फ़िल्म

ऐसे,सेअभिनेता आशुतोष राणा कहते हैं, “किसी की प्रतिभा का विकास उसे मिलने वाले अवसर पर निर्धारित करता है।

राजू के zs w zwszsswzs zzse sewzszs,zपास फ़िलहाल एक ही अवसर आया। मुझे आज भी याद है, राजू के काम का पहला दिन, उसके अंदर ना दिखाई देने वाला भय था, जिसे सार्वजनिक होने में समय लगा। रिक्शे को राजू के पैरों के तालमेल की आदत पड़ चुकी थी, लेकिन राजू को अपना पुरुषार्थ उधार का जान पड़ता था। समय और शक्ति बचाने का राजू का ये सौदा बुरा नहीं था। उसे अपनी जीविका आत्मनिर्भर होकर नहीं, परस्पर निर्भर होकर चलानी पड़ती है, सो इसीलिए राजू आज दिल्ली के मेट्रो स्टेशन के बाहर सवारी की प्रतीक्षा कर रहा है।

                            इस वर्ष गर्मी का तापमान और अधिक है, जिसके कारण सवारी की आवाजाही कम है। कोई सवारी आती भी है, तो वो ई-रिक्शा को खोजती और उसमें बैठ कर चली जाती है। धूल और पसीने से तरतर राजू पेट सहला रहा है। प्रातः भोज से दोपहर के भोज का समय हो गया है, लेकिन राजू को अपने घर में माड़े आटे का हिसाब नहीं मिल पाया है, जिसे वो रात्री भोज के लिए तैयार कर आया था। राजू अकेला नहीं जिसे यह अनुभूति हो रही है। राजू के साथ लाइन में लगे सह रिक्शा चालकों के चेहरों पर भी परम्परागत विरोध दिख रहा है। आज सभी रिक्शा चालकों को देख राजू क्षुब्ध हो गया, लेकिन उनमें से कोई राजू का पक्षधर नहीं था, या यूँ कहूँ कोई नहीं है। खाली उम्मीद से वह बीच-बीच में अपने रिक्शे को कपड़ा मार देता और फिर सवारी को आवाज़ देता। राजू अपनी पुरानी घड़ी को देख सोचता, काश ये दिन ही ढल जाए। फिर कुछ सवारी आई, और फिर किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। राजू फिर अपने रिक्शे की छतरी में आ बैठा, क्योंकि कोई और विकल्प नहीं था। राजू ने कभी रिक्शा चालक से अन्य रूप में कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था, उसे तो बस किराये की गुणा-गणित समझ आती है। कुछ देर सोचने पर राजू के पैर असहमत खुद ही उस ‘मंटू छोले’ की दुकान पर चल दिए, जिसपर वह दोपहर का भोजन करता है। नाराज़ रिक्शा आज बिना सवारी लिए, दोपहर का भोजन कराने के लिए, अपने मालिक को लिए जाने लगा। मानो आज ‘रिक्शा चालक राजू’ रात की अच्छी नींद आने का अधिकार खो चुका हो। राजू ने कभी आक्रांता को अनिवार्य गुण नहीं रहने दिया, जिन्हें भूख लगी है वे ये बात जानते हैं। राजू तो प्रज्ञावादी है, जिसमें पास खड़ा एक रंगमच का छात्र एक किरदार ढूँढ रहा है। भूखा निराश राजू अपने आवाज़ करते रिक्शे को शुरू कर कुछ एक दूरी पर चलाकर ले गया, जैसे वह स्वयं मार्ग और स्वयं मार्गी हो।

तभी पीछे से आवाज़ आई, “रिक्शा वाले भैया!

                                                                                                                                                

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